राजस्थान में 1857 की क्रांति {Revolt of 1857 in Rajasthan} Rajasthan GK

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राजस्थान में 1857 की क्रांति : {Revolt of 1857 in Rajasthan} Rajasthan GK in Hindi

इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री – पामर्स्टन भारत के गवर्नर जनरल – केनिंग

राजस्थान के एजेंट टू गवर्नर जनरल – पैट्रिक लॉरेन्स

अन्य A.G.G. –

मेवाड़ – शावर्स

मारवाड़ – मोक मैसन

कोटा – मेजर बर्टन

जयपुर – विलियम ईउन

सिरोही- जे. डी. हॉल

भरतपुर – मॉरिसन

6 सैन्य छावनी –
नसीराबाद छावनी (अजमेर) – 30वीं पैदल रेजीमेंट

  • सबसे शक्तिशाली छावनी
    नीमच छावनी (MP) – कोटा कन्टिनजेंट
    देवली छावनी (टोंक) – कोटा कन्टिनजेंट
    एरिनपुरा छावनी (पाली) – जोधपुर लीजियन
    व्यावर छावनी (मेर) खेखाड़ा छावनी विद्रोह में भाग नहीं लिया।
  • ए. जी. जी (AGG) का कार्यालय अजमेर में था।
  • अजमेर कमीशनरी की स्थापना 1832 में बैटिक के समय हुई।
    ग्रीष्मकालीन राजधानी – माउंट आबू
  • अजमेर में अंग्रेजो का खजाना व शास्त्रागार था।
  • खजाने व शखागार की सुरक्षा की जिम्मेदारी 15वी बंगाल नेटिव इन्फेन्ट्री की थी।
  • 1857 की क्रांति की शुरुआत मेरठ छावनी से 10 मई 1857 को हुई।
  • 19 मई 1857 को क्रांति की सूचना मांउट आबू पहुँची।
  • 15 वीं नेटिव इन्फैंट्री की सैनिक टुकडियों को नसीराबाद स्थानान्तरित कर दिया गया।

राजस्थान में क्रांति का विस्तार

  • राजस्थान में 1857 को क्रांति की शुरुआत नसीराबाद से हुई।
  • 28 मई 1857 को नसीराबाद में तैनात 15 वी बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के सैनिकों ने अपने अधिकारियों पर हमला कर दिया।
  • मेजर स्फोटिस वुड एवं न्यूबरी की हत्या कर सैनिको ने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया।
  • लेफ्टिनेंट लॉक तथा कप्तान हार्डी घायल हो गए। 18 जून 1857 को क्रांतिकारी दिल्ली पहुँचते हैं।

नीमच में क्रांति का विस्तार :-

  • नीमच में 3 जून 1857 ई. को कर्नल अबॉर्ट को चुनौती देते हुए सैनिकों ने मोहम्मद अली बेग के नेतृत्व में विद्रोह कर शस्त्रागार में आग लगा दी।
  • क्रांतिकारी शाहपुरा, निम्बाहेड़ा, देवली, टोंक, आगरा होते हुए दिल्ली पहुँचे।
  • नीमच में कुछ अंग्रेज परिवार भी थे। ये क्रांतिकारीयों से भयभीत होकर भागकर डुगाला गाँव (चित्तौड) पहुँचे। जहाँ उन्हें रुगाराम नामक किसान ने शरण दी।

-रुगाराम ने इन अंग्रेज परिवारो की सूचना शावर्स को दी।

  • महाराजा ने इन परिवारो को पिछोला झील में बने जगमंदिर में ठहराया और राज्य की ओर से उनकी सुरक्षा का कड़ा प्रबंध किया।
  • शावर्स मेवाड़ की सैनिक टुकड़ी लेकर अजमेर पहुँचा और ए. जी. जी. लॉरेन्स ने कोटा तथा बूंदी की सेना को नीमच भेजा। नीमच में पुन: 8 जून 1857 ई. को अंग्रेजो का अधिकार हो गया |
  • “अंग्रेजो ने अवध के नियम का पालन नही किया, इसलिए हम भी नही करेगें”- मुहम्मद अली बेग ( कोटा रेजीडेंट के ‘घुडसवार)

देवली में क्रांति का विस्तार- 5 जून 1857

  • मीर आलम खाँ के नेतृत्व में ।

एरिनपुरा छावनी का विद्रोह

  • 1835 ई. में अग्रेजो ने जोधपुर की सेना के सवारो पर अकुशल होने का आरोप लगाकर ‘जोधपुर लीजियन’ का गठन किया।
  • 21 अगस्त 1857 को एरिनपुरा छावनी में तैनात एक सैनिक टुकड़ी ने आबू मे विद्रोह कर दिया। – इसका नेतृत्व मोती खाँ, सूबेदार शीतल प्रसाद एवम् तिलकराम ने किया।
  • विद्रोही सैनिकों ने ‘चलो दिल्ली मारो फिरंगी’ के नारे लगाते हुए दिल्ली की ओर चल पड़े।
  • कुशालसिंह चंपावत जोधपुर के तत्कालीन महाराणा तख्त सिंह के विरोधी सामंतों के मुख्य नेता थे।
  • एरिनपुरा के क्रांतिकारी सैनिकों के साथ आऊवा ठाकुर खुशाल सिंह भी सैन्य शामिल हो गए।
  • कामेश्वर महादेव मंदिर व सुगाली माता मंदिर क्रांति की योजना के प्रमुख स्थान थे। बिधौड़ा (पाली) का युद्ध 8 Sep. 1857 ई.
  • कुशालसिंह के नेतृत्व वाली सेना ने जोधपुर के सेनापति ओनाडू सिंह व हीथकोट की सेना को पराजित किया। ओनाड सिंह इस युद्ध में मारा जाता है। चेलावास का युद्ध (1850P.1857) – काला- गोरा का युद्ध ।
  • 18 सितम्बर 1857 को (खुशालसिंह + जोधपुर लीजियन) व पैट्रिक लॉरेन्स की सेना के बीच युद्ध हुआ। इस युद्ध में पेट्रिक लॉरेन्स पराजित हुआ तथा जोधपुर के पोलिटिकल एजेट मैक मोसन की हत्या कर आऊवा के किले के दरवाजे के सामने उसके सिर को लटका दिया।
  • आऊवा की पराजय का बदला लेने के लिए ए. जी. जी. जार्ज लॉरेन्स और होम्स के नेतृत्व में सेना ने 20 जनवरी 1858 ई. को आऊवा पर आक्रमण कर किले पर अधिकार कर लिया।
  • अंग्रेजो ने आऊवा को लूटा तथा आऊवा स्थित सुगाली माता ( 10 सिर 54 हाथ) की मूर्ति को अजमेर ले आये।
  • 8 अगस्त 1860 ई. मे खुशालसिंह ने अंग्रेजों के सामने नीमच मे आत्मसमर्पण कर दिया।
  • मेजर टेलर जांच आयोग ने खुशालसिंह को 10 Nov. 1860 ई. को दोष मुक्त कर दिया।
  • ठाकुर कुशालसिंह की मृत्यु 1864 ई. में उदयपुर मे हुई।
    (Note – वर्तमान में सुगाली माता मूर्ति बांगड संग्रहालय (पाली) में रखी हुई है।

कोटा में विद्रोह

  • 1857 ई. की क्रांति के समय कोटा का शासक रामसिंह द्वितीय था।
  • कोटा के क्रांतिकारी सैनिको ने 150ct. 1857 को कोटा रियासत की सेना के दो सैनिक अधिकारियों मेहराब खाँ और जयदयाल कायस्थ के नेतृत्व में विद्रोह किया।
  • रेजीडेंट मेजर बर्टन और उसके दो पुत्रों तथा दो चिकित्सक सैडलर व सेविल काण्टम की हत्या कर दी।
  • मेजर बर्टन का सिर काटकर सारे कोटा शहर में घुमाया गया।
  • कोटा के महाराव रामसिंह द्वितीय को उनके महल में नजरबंद कर दिया गया एवमं राज्य की 127 तोपो पर कब्जा कर लिया।
  • मार्च 1858 ई. में मेजर जनरल रॉबर्ट्स के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना ने कोटा की सेना पर आक्रमण किया।
  • 30 मार्च 1858 को कोटा पर अंग्रेजी सेना का अधिकार हो गया।

-करौली के महारावल मदनपाल की सेना भी मेजर रॉबर्ट्स के साथ थी।

  • इस विद्रोह के बाद मेहराब खाँ और जयदयाल को फांसी दे दी गई।
  • 6 महीने तक क्रांतिकारियों के अधीन रहने के बाद कोटा पुनः महाराव को प्राप्त हुआ।
  • कोटा में सर्वाधिक भीषण और व्यापक विद्रोह हुआ। इस विद्रोह का जिम्मेदार महाराव रामसिंह – 11 को ठहराते हुए 17 तोपो की सलामी को 13 कर दिया।

मेवाड़ में क्रांति का विस्तार, :-

  • मेवाड़ के अधिकांश सामंत ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध थे। किन्तु मेवाड़ के शासक स्वरूप सिंह ब्रिटिश सहयोगी थे!
  • A.G.G. के निर्देश पर मेवाड़ के महाराणा स्वरूपसिंह ने 27 मई 1857 को अपने सभी सामंतों को पत्र भेजकर ब्रिटिश सैनिक कार्यवाही व शॉवर्स के निर्देशो का पालन करने को कहा।
  • सलूम्बर के रावत केसरीसिंह व कोठरिया के जोधसिंह ने कुशालसिंह को मदद दी।

जयपुर में क्रांति का विस्तार

  • क्रांति के समय जयपुर महाराजा रामसिंह
  • पॉलिटिकल एजेन्ट ‘कर्नल ईडन’ था। रामसिंह -11 ने 1857 की क्रांति मे अंग्रेजों का पूरे तन मन धन से सहयोग किया।
  • रामसिंह द्वितीय को ‘सितार-ए-हिंद’ की उपाधि से नवाजा गया।

करौली में क्रांति का विस्तार

  • कोटा के महाराव रामसिंह द्वितीय को क्रांतिकारियों ने कोटा दुर्ग में नजरबंद कर दिया तो करौली के शासक मदनपाल ने एक बड़ी सेना को कोटा भेजकर महाराव
  • रामसिंह द्वितीय को आजाद करवाया।
  • अंग्रेजो ने करौली के शासक मदनपाल की इस मदद के बदले 17 तोपो की सलामी दी।

प्रतापगढ़ में क्रांति का विस्तार

  • प्रतापगढ़ के शासक महारावत दलपतसिंह ने अपनी सेना नीमच भेजी तथा अपने राज्य से विद्रोहियो को नही गुजरने दिया।
  • दलपतसिंह भी अंग्रेज समर्थक था ।
  • टोंक का नवाब वजीरू‌द्दोला भी अंग्रेज समर्थक था।

बीकानेर में क्रांति का विस्तारः-

सरदार सिंह एकमात्र ऐसा शासक था जो क्रांति को कुचलने हेतु स्वयं सेना लेकर राजस्थान से बाहर सिरसा, हिसार आदि में गया।

  • अंग्रेजों ने सरदार सिंह को इस मदद के बदले उसको टिब्बी परगने के 41 गाँव उपहार में दिए।

(Note) बीकानेर निवासी अमरचंद बाढिया ने अपनी सम्पूर्ण सम्पति तांत्या टोपे को देने का प्रस्ताव रखा तथा ‘दूसरे भामाशाह’ कहलाये।

(Note) ‘आयो इंगरेज मुलक रे ऊपर’ नामक काव्य की रचना जोधपुर के बाँकीदास द्वारा की गई।

बाँसवाडा में क्रांति का विस्तार-

  • बाँसवाड़ा के महारावल लक्ष्मणसिंह 1857 की क्रांति के दौरान अंग्रेजों के प्रति निष्ठावान बने रहे।

डूंगरपुर में क्रांति – 1857 की क्रांति के दौरान डूंगरसिंह के महारावल उदयसिंह ने नीमच के विद्रोही सेना को रोकने में अंग्रेजो की सहायता की।

झालावाड़ मे क्रांति- झालावाड़ के शासक पृथ्वीसिंह ने 1857 की क्रांति के दौरान झालावाड़ में शांति बनाये रखी।

पृथ्वीसिंह अंग्रेज समर्थक शासक था।

दिल्ली में ब्रिटिश अधिकार हो जाने पर झालावाड़ के शासक ने खुशियाँ मनाई व AGG. को बधाई भेजी।

(Note – बूंदी के सूर्यमल्ल मिसण ने पीपल्या के ठाकुर फूलसिंह को पत्र लिखकर अंग्रेजी दासता का विरोध किया।

1857 के बारे में पुस्तकें –

1 द इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेस 1857 V.D. सावरकर
2 द सिपाय म्यूटिनी एंड रिवोल्ट ऑफ 1857- R.C. मजूमदार
3 The Great Rebellion – अशोक मेहता
4 1857 S. N. सेन
5 राजस्थान रोल इन दा स्ट्रगल ऑफ 1857- नाथूलाल खड़‌गावत
6 द म्यूटिनीज इन राजपूताना – प्रिचार्ड

विद्रोह की असफलता के कारण

  • अधिकांश शासको द्वारा ब्रिटिश सत्ता को पर्याप्त सहयोग प्रदान किया गया।
  • क्रांतिकारियों में रणनीति व कूटनीति में दक्ष नायकों का अभाव। सेना
  • क्रांति के लिए पर्याप्त योजना व उचित सूझबूझ का अभाव ।
  • क्रांति के लिए अखिल भारतीय दृष्टिकोण का अभाव क्रांतिकारियों के पास धन, रसद, हथियारों की कमी।

1857 के विद्रोह का परिणाम —

  • 1857 की क्रांति असफल रही लेकिन देश को स्वतंत्र कराने की दिशा में दीप प्रज्जवलित कर दिया।
  • इस विद्रोह के तात्कालिक राजनीतिक प्रभाव पड़ा। ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया ने ब्रिटिश संसद में ‘भारत शासन अधिनियम – 1858 लागू किया, जिससे भारत मे EFC का शासन समाप्त हो गया और भारत का शासन ब्रिटिश सरकार के अधीन चला गया।
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